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अभिनव सुरक्षा – राजस्थान का पुलिस तंत्र कैसा हो?

आप चकित हो जायेंगे यह जानकर कि राजस्थान की पुलिस में काम कर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों में से 95 प्रतिशत अच्छे हैं। आप कहेंगे कि यह तो बिल्कुल झूठ है। पुलिस निकम्मी है, भ्रष्ट है। जी नहीं, ऐसा है नहीं । फिर वही गलत धारणा की बात। एक बार बन गयी, तो बिना गहराई में गये, हम उसे दोहराते जायेंगे। आप तो यहाँ बस, इतना सा सोचकर देखिये कि अगर आप स्वयं पुलिस में होते, तो क्या करते? ठंडे दिमाग से विचार करेंगे, तो समझ भी आ जायेगा कि बीमारी कहीं और है! शायद आप उस निष्कर्ष पर पहुँच जायेंगे कि समस्या व्यक्तियों में नहीं, तंत्र में है, सिस्टम में है। आइये, इसी पर आगे बढ़ते हैं।
पुलिस कौन है ?
विकसित समाज में अपने सभी काम कोई परिवार नहीं कर सकता। पहले ऐसा चलता था। घर में ही शिक्षा हो जाती थी। खेती या पशुपालन या कुटीर उद्योग घर के लोग कर लेते थे। केवल सुरक्षा के लिए सामूहिक व्यवस्था रहती थी। आज कई क्षेत्रों में हमें सामूहिक व्यवस्था करनी पड़ रही है, क्योंकि हमारी आवश्यकताओं का दायरा बढ़ रहा है। इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमने कर या टैक्स देना मंजूर किया है। इस कर से शिक्षा-स्वास्थ्य-पानी-बिजली के साथ ही सुरक्षा की व्यवस्था भी हो पा रही है। यानि हमने समाज के कुछ लोगों को मानदेय (वेतन) देकर सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंप रखी है। जैसे गाँव के मन्दिर या मस्जिद या गौशाला की जिम्मेदारी कुछ लोगों को दी जाती है, वैसी ही व्यवस्था हमने सुरक्षा के लिए कर रखी है। समाज के बनाये नियमों (कानूनों) की पालना पुलिस को करवानी है, और इसके लिए उन्हें कुछ अधिकार भी दे रखे हैं। न्यायालय, जेल और पुलिस इसी व्यवस्था के तहत बने हैं।

फिर पुलिस से दूरी क्यों?
लोकतंत्र के छह दशक बीतने पर भी हम अभी तक आम जनता तक यह बात पहुंचाने में विफल रहे हैं कि शासन उनके द्वारा दिये गये करों से चलता है। हमारी सबसे बड़ी समस्या भी यही है और लोकतंत्र की हार भी यहीं पर हुई है। शासन में बैठे लोग माई-बापबने हुए हैं और मनमानी करते रहते हैं, जबकि जनता उनसेनिवेदन’, ‘याचना’, ‘मांगकरती रहती है। आपकी फैक्टरी का मैनेजर, आपका माई-बाप कैसे हो सकता है। लेकिन ऐसा क्यों है? आप आजादी (?) को याद करें। यह बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया फार्मूला है कि कड़े संघर्ष से आजादी मिली है। हकीकत तो यह है कि भगत सिंह-सुभाष का हमने साथ ही नहीं दिया था। इसीलिए तो उनके प्रति अभी भी जनमानस की भावना उमड़ नहीं पा रही है। उनकी जयंती-पुण्यतिथि पर कहाँ मेले लगते हैं। 30 के दशक में भगत सिंह की लगाई आग ठंडी पड़ गयी थी, तो 40 के दशक में सुभाष का बलिदान भी जनता की उदासीनता व कुछ स्वार्थी कूट नेताओं की करतूतों से निष्फल रह गया था। यह तो ब्रिटेन की अन्दरूनी समस्याओं से मात्र सत्ता हस्तान्तरण हुआ था। हाँ, सुभाष बोस के बलिदान व संघर्ष से फैला असंतोष भी इसका एक अन्य कारण था, परन्तु उस कारण को कभी महिमामंडित नहीं होने दिया गया।
तो इस सत्ता हस्तान्तरण को लोकतन्त्र की चाशनी में लपेटकर आजादीकह दिया गया। आप बाहर लगी चासनी चाटते रहे, भीतर तो वही राजतंत्र-सामंतवाद का ढाँचा है। यह पुलिस उसी सामंतवाद की रीढ़ की हड्डी थी। आमजन को डराने- धमकाने का सबसे बड़ा हथियार था, जो राजाओं और अँग्रेज़ों ने बेदर्दी से काम में लिया था। अपने पुराने कानून के साथ यह पुलिस वैसी की वैसी नये तंत्र में शामिल हो गयी। राजतंत्र के समय दरिदंगी करने वाले सभी अधिकारी नये तंत्र में नये राजाओं के काम आने लगे। सागरमल गोपा, कालीबाई भील और सैकड़ों भीलों-किसानों का खून करने वाले अधिकारी बाइज्जत तंत्र के मालिक बन गये। अपने साथ ये वही पुरानी संस्कृति लेकर आये। मारो-पीटो-डंडा मारो। चाहे जिसे, चाहे जिस कानून की आड़ में बंद कर दो।
इधर लोकतंत्र परिपक्व होने का कोई कारण भी नहीं था। नये राजा’(नेता) ये चाहते भी नहीं थे, नये सामंत (प्रशासक) भी क्यों चाहते। जनता से दूरी का अपना आनंद होता है। शोषण में आसानी रहती है। रौब पड़ता है। और पुलिस अब भी उनकी दूरी कायम रखने का औजार थी। इसी संदर्भ में आप पुलिस से जनता की दूरी को समझेंगे, तो परिवर्तन होगा। वरन् भ्रष्टाचार की तरह, पुलिस पर कविताएँ पढऩे या आलोचना ग्रन्थ लिखने से आप समस्या को और अधिक उलझाने का कार्य करेंगे। पुलिस से जनता दूर है, यह कटु सत्य है। पुलिस में जो भी चला गया, वह यह दूरी कम नहीं करना चाहेगा। फिर क्या मजा रह जायेगा, पुलिस में रहने का! नेता भी नहीं चाहेंगे कि जनता पुलिस के पास पहुँचे। फिर वे नेता किसलिए? इसीलिए तो अभी तक पुलिस में सुधारों पर स्थानीय स्तर पर कोई चर्चा नहीं होती है।
दूरी कम करने के प्रयास
विभिन्न संगठन इस दूरी को कम करने का प्रयास करते रहते हैं। कई अच्छे-संवेदनशील अधिकारी भी यह चाहते हैं, परन्तु यह तर्क भी देते रहते हैं कि पुलिस का खौफ खत्म हो गया, तो अराजकता फैल जायेगी। इस डर से सुधारक भी पीछे हट लेते हैं कि कहीं कोई गुंडा उन्हें राह चलते गालियां देना शुरू न कर दे। उधर नेताओं में से आज तक किसी ने भी जनता को पुलिस से जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। गृह मंत्रियों के द्वारा लगभग न के बराबर पुलिस-जनता सम्बन्धों में रुचि ली जा रही है। कटारिया हो या धारीवाल, राजे हो या गहलोत, कोई भी इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता। न्यायालय और मीडिया भी इस रौबमें भागीदारी तक ही अपने को सीमित रखते हैं। पुलिस को फटकार या पुलिस का घोटाला उजागर करने के नाम पर तीसरे और चौथे स्तम्भ को भी आत्म संतुष्टि मिल जाती है। अभी बीच में मानवाधिकारों के नाम पर काफी हल्ला मचा है। इतना जरूर हुआ है कि अब हथकड़ियाँ डालकर इज्जत खराब करना या थानों में मारपीट का नंगा नाच थोड़ा कम हुआ है। लेकिन इन सुधारों से पैसे वालों और अपराधियों को अधिक लाभ मिला है, गरीब व सज्जन तो अभी भी थाने में दुर्व्यवहार व प्रताड़ना झेलते हैं। भारत में यही मजा है। कोई भी कानून बनाइये, सबसे आगे दुरुपयोग करने वाले खड़े मिलेंगे। मानवाधिकारों का दुरुपयोग भी जम कर हुआ है। अपराधियों में भय, आमजन में विश्वास का नारा उलटा पड़ गया है। आम जन अभी भी थाने जाने से बचता है, तो अपराधी को थाना अपनासा लगता है।
मानवाधिकार संगठनों के दबाव में थानों में सी.एल.जी. नाम की समिति भी बनायी गयी है। आप में से कई लोग इसके सदस्य भी रहे होंगे। 2006 से राजस्थान में यह व्यवस्था चल रही है। कुछ नागरिकों को थाने में चाय-कचोरी खिलाकर राजी रखा जाता है। उनके कानून व्यवस्था पर कुछ बातें होती हैं। पुलिस ने 2006 के आदेश की पालना बता दी, तो समाज के यह कुछ अति उत्साही-जागरूक नागरिक भी खुश। जान-पहचान बढ़ी, थाने में जाकर कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य मिला। उनकी तोदूरीकम हुई, परन्तु जनता अभी भी दूर है। वहीं 2006 के सी.एल.जी. के आदेश के अनुसार भी समिति का संचालन नहीं हो रहा है और यह मात्र खानापूर्ति बनकर रह गयी है। पुलिस के अफसर क्यों परेशान होंगे जब हमारे जन प्रतिनिधि भी इसके लिए गम्भीर नहीं है।
पुलिस की नौकरी का आकर्षण
अब तो अंदाज लग जाना चाहिए कि पुलिस में भर्ती होने का इतना आकर्षण क्यों है? कांस्टेबल से आई.पी.एस. तक की नौकरी के लिए हमारी प्रतिभाएँ लालायित हैं। कोई वैज्ञानिक या अध्यापक नहीं बनना चाहता। जनता से दूरी से पड़ने वाला रौब इसका प्रमुख आकर्षण है। हम अभी तक भी सामंतवाद में विश्वास रखने वाले लोग हैं। इसलिए सामंतवाद की प्रतीक पुलिस के अंग बनना चाहते हैं। प्रारम्भ में आपको यही सोचने के लिए कहा था कि अगर आप पुलिस में होते, तो क्या करते? आप वहाँ नहीं है, तभी तक ही पुलिस के काले कारनामे और भ्रष्टाचार आपको दिखाई देते हैं। आप भी वहाँ जायेंगे, तो दृष्टिकोण बदल जायेगा। भ्रष्ट नहीं बनोगे, तो भी पुलिस के पक्ष में तर्क सूझने लगेंगे। जनता की सोच व जिम्मेदारी में कमी नजर आने लगेगी।
भ्रष्टाचार
अभिनव राजस्थान में भ्रष्टाचार कभी भी बीमारी नहीं मानी जायेगी। यह लक्षण ही रहेगा। पुलिस में भी कई लोग भ्रष्ट तरीक़ों से पैसा और सम्पत्ति बना लेते हैं, क्योंकि समाज पैसे की इज्जत करता है। इस इज्जत पर अधिक जोर होने से पुलिस में लगे लोग भी इस पर खरा उतरना चाहते हैं। इससे अधिक पुलिस को ही इस दृष्टि से दोषी ठहराना ठीक नहीं है। जब हम ज्ञान और कला की इज्जत करना शुरू कर देंगे, सादगी को जीवन का अंग बना देंगे, भ्रष्टाचार स्वत: विदा हो जायेगा।
अभिनव राजस्थान की पुलिस
फिर अभिनव राजस्थान की पुलिस कैसी होगी? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि वह हमारीअपनीपुलिस होगी। यानि जो हमें अपनी लगे, अपने लिए उसका होना लगे। इसके लिए बड़े जनजागरण की आवश्यकता होगी, जो अभिनव राजस्थान के मूल में है। हमें यह मानना होगा कि बिना समाज को तैयार किये, कोई भी व्यवस्था अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पायेगी। इस कार्य में हम जितना बचेंगे, उतना ही भारत देश उलझता रहेगा। तो आइये, हम नई व्यवस्था को समझते हैं।
1. संरचना में बदलाव
प्रत्येक पंचायत समिति या ब्लॉक पर एक सुसज्जित पुलिस स्टेशन होगा। इस स्टेशन का कार्यक्षेत्र 25 से 30 किमी के दायरे तक सीमित होगा। छोटे-छोटे गाँवों से थानों और चौकियों की आवश्यकता नहीं है। इस उच्च स्तरीय स्टेशन का प्रभारी एक आर.पी.एस. होगा और उसके साथ तीस निरीक्षक होंगे। सभी निरीक्षक अपने बल के साथ मात्र 8 घंटे ड्यूटी करेंगे।
महानिदेशक एक ही होगा, जिसका सहयोग तीन अतिरिक्त महानिदेशक करेंगे-जो प्रशिक्षण, इन्टेलीजेन्स और कार्मिकी का काम देखेंगे।
2. कार्यों में बदलाव
हमारे इस आदर्श पुलिस स्टेशन का मुख्य कार्य अपराधों की रोकथाम और इंटेलीजेन्स होगा, जैसा किताबों में लिखा है। इस स्टेशन को अपने दायरे में होने वाली प्रत्येक असामान्य घटना या किसी भी असामाजिक गतिविधि पर नजर रहेगी। दूसरा महत्वपूर्ण कार्य अपराधों की जाँच का होगा। आधुनिक पद्धतियों से जाँच पर अधिक जोर रहेगा। 18 वीं सदी की पुलिस के स्थान पर 21 वीं सदी की गतिशील पुलिस रहेगी। तीसरा महत्वपूर्ण कार्य आकस्मिक परिस्थितियों में तैयारी होगी। 108 एम्बुलैन्स की तरह प्रत्येक स्टेशन पर एक विशेष प्रशिक्षित बल होगा, जो पलक झपकते ही घटना स्थल पर पहुँचेगा। इस बल का कार्य घटना स्थल पर शांति कायम करना, अपराधी को स्टेशन पहुँचाना व घायलों को स्वास्थ्य विभाग की मदद से अस्पताल पहुँचाना होगा। इस बल में काम करन वालों को अतिरिक्त मानदेय दिया जायेगा।
इन्टेलीजेन्स का काम अब औपचारिकता से भरा खानापूर्ति का नहीं होगा। सबसे अधिक सक्षम अधिकारी इस कार्य को देखेंगे, परन्तु इसके लिए पुलिस स्टेशन प्राथमिक इकाई होगा। अविश्वास की कड़ी को तोडक़र प्रत्येक स्टेशन को इस काम में सक्रिय किया जायेगा।
3. पुलिस दूसरे विभागों में दखन न दे पुलिस गीली लकडिय़ाँ क्यों पकड़े? प्रदेश में 100 से अधिक आई.एफ.एस. (वन सेवा) अफसर हैं, जो 70 हजार से 1 लाख की तनख्वाह पाते हैं। वे क्या करेंगे? पुलिस शराब क्यों पकड़े? आबकारी विभाग क्या करेगा? पुलिस वाहनों की चेकिंग क्यों करती फिरे? परिवहन विभाग है न। आपको आश्चर्य होगा कि पुलिस में दर्ज मुकदमों में से तीन चौथाई से अधिक मुकदमे दूसरे विभागों के कार्यों में दखलअंदाजी के कारण है? अब जैसे मनाया जा रहा है कि कलक्टर ही देशभक्त है और बाकी सभी कर्मचारी देशभक्त नहीं है, वैसे ही पुलिस ही कानून की रक्षक है, बाकी विभाग कामचोर है, ऐसा दर्शाया जा रहा है। या फिर इस दखलअंदाजी के अपने फायदे हैं? आप पुलिस विभाग के क्राइम के वार्षिक आँकड़े देखेंगे, तो शायद तस्वीर साफ हो जायेगी। इन दखलंदाजियों से ही पुलिस का रौब बढ़ता है, परन्तु अपराधों की जाँच का उन्हें कम समय मिलता है। और यह अजीब फैशन बन गया है भारत में। दूसरों की थाली में ही घी अधिक नजर आता है। कलक्टर भी अपना भूमि विवाद निपटाने का काम कम करते हैं, स्कूल-अस्पताल की चिंता अधिक करते हैं। 2010 में दर्ज 169570 मुकदमों में से 126490 (77 प्रतिशत) मुकदमे अन्य विभागों से सम्बन्ध रखते हैं। इसी से पुलिस का काम बढ़ता है, दाम भी बढ़ता है।
पाठकों और अभिनव राजस्थान के मित्रों के व्यावहारिक सुझाव आमंत्रित है।

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