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असली आजादी की आहट ……..

15 अगस्त पर विशेष

 डॉ. अशोक चौधरी  (94141-18995)

एक और पन्द्रह अगस्त आ गया। बचपन से सुनते आये हैं कि इस दिन भारत देश को आजादी मिली थी। हमें यह बताया गया है कि गांधी और नेहरु ही इस आजादी के नायक थे। तब यह नहीं बताया गया था कि अगर गांधी भी नायक थे तो 15 अगस्त 1947 की रात को वे कहाँ थे। वे दिल्ली में नेहरु के जश्न में क्यों नहीं थे। तब यह भी नहीं बताया गया था कि आजादी से पहले देश के विभाजन को लेकर क्या राजनीति हुई थी। हमें तो यह भी नहीं बताया गया था कि नेहरु को प्रधानमंत्री चुने जाने का फैसला काँग्रेस में कैसे लिया गया था। कई वर्षों तक किताबों में लिखे को सच मानकर चलते रहे। तभी अचानक समझ के झटके लगे तो मालूम हुआ कि अभी तक तो महज नींद में थे। सपना देख रहे थे। आजादी कहां मिली। कब मिली। जिसे हम आजादी समझ बैठे थे, वह तो मात्र सत्ता का हस्तांतरण ही था। एक हाथ से सत्ता दूसरे हाथ में गई थी। अंग्रेजों के हाथ से सत्ता, कुछ स्थानीय चतुर राजनीतिज्ञों और अफसरों के हाथ में आ गई थी। बस इतना ही हुआ था।

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       इन चतुर राजनीतिज्ञों और अफसरों के वारिस 65 वर्षों से ‘राज’ चला रहे हैं। वही ब्रिटिश ‘राज’ ! बदले स्वरूप में। 65 वर्ष कम थोड़े ही होते हैं। एक पूरी पीढ़ी इसी मुगालते में खत्म हो गई है कि हम एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं। जबकि हमें बराबर लगता रहता है कि हम अभी भी किसी ‘राज’ के अधीन जी रहे हैं। किसी ‘सरकार’ की मेहरबानी में जी रहे हैं। तभी तो ‘राज’ से, ‘सरकार ‘ से दूरी महसूस होती है। सचिवालय, कलेक्ट्रेट, तहसील कार्यालय, पुलिस थाना, अस्पताल आदि से कोई अपनापन स्थापित नहीं हो पाया है। यूं लगता है जैसे इनके मालिक कोई और हैं, हम तो नहीं हैं। और ऐसा लगना किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी होती है। मूल बीमारी होती है। यह अलगाव ही सभी बीमारियों की जड़ में है। यह दूरी ही कुशासन को पनपाती है, यह दूरी ही भ्रष्टाचार को बढ़ाती है। इस दूरी से ही विकास के रास्तों में रुकावट आती है। यह दूरी ही निराशा और अविश्वास को जन्म देती है। ऐसे में प्रश्न यही है कि  ‘राज’ से इस दूरी को कम कैसे किया जा सकता है। कैसे असली आजादी का अहसास आमजन को करवाया जा सकता है? पहले कहा गया था कि वोट की ताकत से जनता अपने ‘राज’ को बनाने का लुत्फ़ ले सकती है। अपने प्रतिनिधि चुनकर ‘राज’ को अपने भले में और देश के विकास में लगा सकती है। आजाद भारत में जीने का दंभ भर सकती है। परन्तु समय के साथ यह भ्रम भी टूट गया। राजनैतिक दलों ने यह भ्रम बड़े ही प्रेम से, शांति से तोड़ दिया। सभी दलों में घुस चुके स्वार्थी तत्वों ने अपने- अपने दलों को अंग्रेजों के ढर्रे पर डाल दिया। बस ‘राज’ को हथियाने और उसमें बने रहने को ही अपने दल का एक मात्र लक्ष्य बना लिया। ‘विचारधारा’ ‘लोकनीति’ या देश के ‘विकास की दृष्टि’ से सभी दलों ने किनारा कर लिया। ऐसे में जनता के सामने सीमित विकल्प रह गया। जो भी चुनावी दंगल में हैं, उनमें से किसी एक को चुनो। दो राष्ट्रीय स्तर के दल और अनेक क्षेत्रीय दलों के जाल में फंसकर मतदाता रह गया है।
          लेकिन इस बीच आजादी का अहसास दिलाने के लिए कुछ राष्ट्रभक्तों द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास भी हुए हैं। सीमित सफलताओं के साथ। 1950 के दशक में ही डॉ। श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘जनसंघ’ नाम का दल बनाकर जनता को आजादी में भरोसा दिलाना चाहा था। एक आदर्श दल की स्थापना कर उन्होंने लोकतंत्र को गाँव-क़स्बों तक पहुंचाने का संकल्प लिया था। परन्तु इन दोनों महापुरुषों के समय पूर्व और संदेहास्पद निधन से यह काम अधूरा ही रह गया। उनके जाने के बाद जनसंघ का भाजपा में परिवर्तन सुखद नहीं रहा। भाजपा के रूप में विस्तार, गुणवत्ता की कीमत पर ही हुआ। सत्ता लोलुपता से पीड़ित तत्वों ने भाजपा को ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ से एक आम राजनैतिक दल के स्तर तक पहुंचा दिया। जनसंघ के इस भाजपाई प्रयोग की असफलता का देश के लिए क्या अर्थ निकला? निराशा के अन्धकार का फिर गहरा जाना। आज फिर यह दल राष्ट्रीय आधार बनाने की मुहिम छोड़ नापाक गठबंधनों में भारत का और खुद का भविष्य देख रहा है। जनता आज भी इस दल की ओर आशा और उम्मीद से देख रही है, पर यह दल आत्मविश्वास की कमी के चलते दूसरों की ओर ताक रहा है।
       वहीं 1960 के दशक में लाल बहादुर शास्त्री ने कॉंग्रेस में भी एक सकारात्मक कोशिश की थी। एक आदर्श चरित्र के नेता के रूप में उन्होंने जनता को पुनः आशावादी बनाया था। 1965 में पाकिस्तान को हराकर और हरित क्रान्ति की नींव रखकर शास्त्रीजी ने, एक तरह से सुभाषचंद्र बोस के काम को ही आगे बढ़ाया था। ‘जय जवान’ और ‘जय किसान’ का उनका नारा बोस के ‘जय हिंद’ के नारे की तरह आम आदमी की जबान पर चढ़ गया था। परन्तु देश के गद्दारों ने सुभाष चंद्र बोस, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की तरह शास्त्री जी को भी दुनिया से चलता कर दिया। ताशकंद में जो कुछ हुआ, उस पर आज भी पर्दा डाला हुआ है। शास्त्री जी के बाद कॉंग्रेस भी फिर एक परिवार की विरासत बन कर सिमट गई।
       इसके बाद जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के नारे से एक बार फिर असली आजादी की उम्मीद से जनता को भर दिया था। जे पी ने भी सुभाषचंद्र बोस के सपनों का भारत बनाने का वादा किया था। मगर उनकी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ बदल गयी ‘सम्पूर्ण भ्रान्ति’ में ! इस परिवर्तन को भी सत्तालोलुप तत्त्व खा गए थे। 1977 में भी 1947 की तरह केवल सत्ता का हस्तांतरण ही हो पाया था। सत्ता की अदलाबदली ही हो पाई थी । व्यवस्था नहीं बदली, जैसा जे पी चाहते थे। इंदिरा गांधी के हाथ से सत्ता गई मोरारजी देसाई के हाथ में। इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ। मोरारजी भी नेहरु की तरह भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कब से टकटकी लगाए बैठे थे। मौका लगते ही चिपक लिए। फिर जो मारा मारी सत्ता के लिए मची तो जनता को निराश करके ही थमी।
       असली आजादी के लिए ये तीन प्रयास तीन दशकों में हुए थे। 1950 के दशक में मुखर्जी और उपाध्याय ने ‘जनसंघ’ के रूप में प्रयास किया;  1960 के दशक में शास्त्री ने और 1970 के दशक में जे पी ने प्रयास किये थे। पर एक के बाद एक प्रयास के असफल होने से जनता ने भी हार मान ली और अपनी चिरपरिचित गुलामी में ही अपनी भलाई समझने लगी। जनता को राजतंत्र में ही सुरक्षा दिखाई देने लगी। लोकतंत्र से डर लगने लगा। इसीलिये गांव से लेकर दिल्ली तक वंशवाद पनपने लगा। एक नया तंत्र भारत में विकसित हो गया- राजतंत्रात्मक लोकतंत्र। लोग अपने लिए राजाओं का चुनाव करने लगे। कबीलाई मुखियाओं का चयन करने लगे।
         परन्तु इन चुने हुए राजाओं – रानियों – राजकुमारों – राजकुमारियों और कबीलाई सरदारों ने अपने सामंतों (अफसरों) के साथ मिलकर पिछले 35 वर्षों में कुशासन और भ्रष्ट आचरण से जनता को त्रस्त कर दिया है। देश के विकास को रोक दिया है। ‘राज’ से दूरी को और बढ़ा दिया है। विदेशियों से अनैतिक समझौते कर जनता को शोषण की खाई में धकेल दिया है। अविश्वास, असुरक्षा और अराजकता का वातावरण बना दिया है। ऐसे में इतिहास अपने को दोहराने की आदत कैसे छोड़ सकता है। जनता में छटपटाहट होने लगी है। अन्ना और बाबा इसछटपटाहट को बढ़ाने में लगे हैं। सभी राजनैतिक दल असहज होने लगे हैं। घबराने लगे हैं। फिर असली आजादी की आहट सुनाई देने लगी है। लगता है कि एक बार फिर आजादी हमारे पास आयेगी। काश ! इस बार असली आजादी को हम पकड़ कर बैठ जाएं, उसे पास से गुजर न जाने दें, जैसा आज तक करते आये हैं। काश ! इस बार हम गुलामी की जंजीरों को हमेशा के लिए फेंक दें। उन्हें आभूषण समझ कर पहने न रखें, जैसे अभी रखा हुआ है।

About Dr.Ashok Choudhary

नाम : डॉ. अशोक चौधरी पता : सी-14, गाँधी नगर, मेडता सिटी , जिला – नागौर (राजस्थान) फोन नम्बर : +91-94141-18995 ईमेल : ashokakeli@gmail.com

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One comment

  1. sir ji subhas chandra boss to plane cresh me mare gaye the na???????

    pls sir agar me galat hun to batana ki sahi kya hai plsssssssssssssssssss……….

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